El Nino and Agriculture in Rajasthan : राजस्थान की तपती दोपहरों में इन दिनों एक ही चर्चा है। लोग आसमान की तरफ देख रहे हैं और आने वाले ‘चौमासे’ का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन इस बार हवाओं का रुख कुछ अलग संकेत दे रहा है। मौसम विभाग से लेकर गांव की चौपालों तक एक ही शब्द गूँज रहा है वो है – अल नीनो।
प्रशांत महासागर के पानी में हो रही हलचल का सीधा संबंध हमारे खेतों से है। अल नीनो भारत मानसून के लिए आमतौर पर अच्छी खबर नहीं लाता। जब भी यह सक्रिय होता है, भारत में बारिश की मात्रा कम हो जाती है। खासकर राजस्थान जैसे राज्य के लिए, जहाँ पानी की एक-एक बूंद कीमती है, यह स्थिति चिंताजनक है।
अल नीनो क्या है और यह कैसे काम करता है?
सरल भाषा में कहें तो अल नीनो समुद्र के तापमान में होने वाला एक बदलाव है। मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का पानी जब सामान्य से अधिक गरम हो जाता है, तो उसे अल नीनो कहते हैं। यह गर्मी हवाओं के पैटर्न को पूरी तरह बदल देती है।
इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है। कहीं बाढ़ आती है, तो कहीं भयंकर सूखा। भारत के मामले में, यह मानसूनी हवाओं को कमजोर कर देता है। नमी वाली हवाएं भारत की तरफ आने के बजाय दूसरी दिशा में मुड़ जाती हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बार अल नीनो की तीव्रता काफी अधिक हो सकती है। इसका मतलब है कि बारिश में कमी आने की संभावना बहुत ज्यादा है। पिछले कुछ दशकों का रिकॉर्ड देखें तो जब भी अल नीनो आया है, भारत में सूखे की स्थिति बनी है।
अल नीनो भारतीय मानसून पर कैसे असर डालता है?
भारतीय मानसून एक जटिल प्रक्रिया है। यह हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच के तालमेल पर टिका है। अल नीनो भारतीय मानसून के चक्र को धीमा कर देता है। इसके कारण मानसून के आने में देरी होती है या फिर बारिश के बीच में लंबे सूखे अंतराल आ जाते हैं।
जून से सितंबर के बीच होने वाली यह बारिश भारत की 50 प्रतिशत से अधिक खेती के लिए जिम्मेदार है। अगर मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, तो खरीफ की फसलों पर सीधा संकट आता है। धान, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों को भारी नुकसान होता है।
सिर्फ बारिश ही नहीं, अल नीनो तापमान को भी बढ़ा देता है। इससे वाष्पीकरण की दर बढ़ जाती है और जलाशयों का पानी तेजी से सूखने लगता है। सिंचाई के लिए पानी की कमी पैदा हो जाती है।
राजस्थान के लिए El Nino के गंभीर मायने
राजस्थान की भौगोलिक स्थिति इसे अल नीनो के प्रति बहुत संवेदनशील बनाती है। यहाँ का बड़ा हिस्सा रेगिस्तानी है। यहाँ खेती मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर है। जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर जैसे जिलों में बारिश पहले ही कम होती है।
अगर इस साल अल नीनो का प्रभाव रहा, तो इन इलाकों में चारे का संकट खड़ा हो सकता है। पशुपालन यहाँ की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। घास और चारे की कमी का मतलब है पशुओं का पलायन। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका होगा।
हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर जैसे नहरी इलाकों में भी चिंता बढ़ रही है। अगर हिमालयी क्षेत्रों में बारिश कम हुई, तो नहरों में पानी का स्तर गिर जाएगा। इससे कपास और ग्वार की बुवाई प्रभावित होगी।
ऐतिहासिक आंकड़े क्या कहते हैं?
इतिहास गवाह है कि अल नीनो का भारत पर प्रभाव हमेशा नकारात्मक रहा है। 2002, 2004, 2009 और 2015 के सूखा ग्रसित सालों को याद कीजिए। इन सभी वर्षों में अल नीनो सक्रिय था। 2009 का सूखा पिछले कई दशकों में सबसे भयानक था।
आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 100 सालों में जितने भी सूखे पड़े हैं, उनमें से लगभग 60 प्रतिशत का सीधा संबंध अल नीनो से रहा है। हालांकि, हर अल नीनो सूखा नहीं लाता, लेकिन इसकी संभावना हमेशा 70 से 80 प्रतिशत रहती है।
कभी-कभी ‘इंडियन ओशन डिपोल’ (IOD) अल नीनो के असर को कम कर देता है। अगर हिंद महासागर का पश्चिमी हिस्सा गरम हो जाए, तो वह मानसून को सहारा देता है। लेकिन इस साल IOD की स्थिति भी बहुत ज्यादा उत्साहजनक नहीं दिख रही है।
खेती और अर्थव्यवस्था पर El Nino का प्रभाव
जब मानसून कमजोर होता है, तो सबसे पहले असर खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर पड़ता है। दालें, तिलहन और अनाज की पैदावार घटने से महंगाई बढ़ती है। ग्रामीण इलाकों में लोगों की आमदनी कम हो जाती है।
राजस्थान में बाजरा एक प्रमुख फसल है। बाजरे को कम पानी चाहिए होता है, लेकिन शुरुआती बढ़त के लिए मानसून की फुहारें जरूरी हैं। अल नीनो के कारण अगर शुरुआत में ही बारिश नहीं हुई, तो किसान बुवाई करने से डरेंगे।
बिजली की मांग भी इस दौरान बढ़ जाती है। बारिश न होने पर किसान ट्यूबवेल का सहारा लेते हैं। इससे भूजल स्तर और नीचे चला जाता है। साथ ही, बिजली ग्रिड पर दबाव बढ़ता है जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली कटौती की समस्या पैदा होती है।
क्या इस बार स्थिति अलग होगी?
शायद आप सोच रहे हों कि क्या हमेशा अल नीनो बुरा ही होता है? कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि मौसम के पूर्वानुमान हमेशा 100 प्रतिशत सही नहीं होते। कभी-कभी स्थानीय कारक अल नीनो के प्रभाव को दबा देते हैं।
लेकिन जोखिम लेना समझदारी नहीं है। सरकार और कृषि विभाग पहले से ही अलर्ट पर हैं। किसानों को ऐसी फसलें उगाने की सलाह दी जा रही है जो सूखे को सह सकें। कम समय में पकने वाली फसलों पर जोर दिया जा रहा है।
हमें लगता है कि इस बार हमें पानी के प्रबंधन पर सबसे ज्यादा ध्यान देना होगा। राजस्थान में पारंपरिक जल संरक्षण की विधियां जैसे ‘टांका’ और ‘बेरी’ अब फिर से प्रासंगिक हो गई हैं।
किसानों के लिए कुछ जरूरी सुझाव
अगर आप खेती से जुड़े हैं, तो अल नीनो के इस दौर में कुछ सावधानियां बरतनी जरूरी हैं।
- फसल का चुनाव: ऐसी फसलों का चुनाव करें जिन्हें कम पानी की जरूरत हो। बाजरा, मूंग और मोठ जैसी फसलें राजस्थान के लिए बेहतर विकल्प हैं।
- बीज की किस्म: सूखे को सहने वाली उन्नत किस्मों के बीजों का ही उपयोग करें।
- मल्चिंग तकनीक: मिट्टी की नमी को बचाने के लिए मल्चिंग का प्रयोग करें। इससे वाष्पीकरण कम होता है।
- ड्रिप सिंचाई: अगर संभव हो तो फव्वारा या ड्रिप सिंचाई पद्धति अपनाएं। इससे पानी की भारी बचत होती है।
- पशुओं के लिए भंडारण: चारे का स्टॉक पहले से ही करके रखें ताकि संकट के समय परेशानी न हो।
जल संरक्षण: समय की मांग
सिर्फ किसान ही नहीं, आम आदमी को भी पानी की बर्बादी रोकनी होगी। शहरों में भी जल संकट गहरा सकता है। बीसलपुर जैसे बांधों का जलस्तर मानसून पर ही निर्भर करता है। अगर बारिश कम हुई, तो जयपुर और अजमेर जैसे शहरों में पानी की कटौती बढ़ सकती है।
छत के पानी को इकट्ठा करने की प्रणाली (Rainwater Harvesting) अब एक विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत है। हमें यह समझना होगा कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम अब पहले जैसा अनुमानित नहीं रहा।
राजस्थान के पुराने शहरों की बावड़ियां और कुएं आज भी हमें याद दिलाते हैं कि हमारे पूर्वज पानी की कीमत जानते थे। हमें उसी पुरानी समझ को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ना होगा।
निष्कर्ष
अल नीनो एक प्राकृतिक घटना है जिसे हम रोक नहीं सकते। लेकिन हम अपनी तैयारी पुख्ता कर सकते हैं। अल नीनो भारतीय मानसून के लिए एक बड़ी चुनौती है, खासकर राजस्थान जैसे शुष्क राज्य के लिए।
आने वाले महीने कठिन हो सकते हैं। हमें वैज्ञानिक सलाह और पारंपरिक ज्ञान के मेल से इस स्थिति का सामना करना होगा। पानी की बचत, सही फसल का चुनाव और संसाधनों का समझदारी से उपयोग ही हमें इस संभावित सूखे से बचा सकता है।
अंत में, उम्मीद यही है कि प्रकृति हमें चौंका दे और अल नीनो का असर उम्मीद से कम रहे। लेकिन समझदारी इसी में है कि हम सबसे खराब स्थिति के लिए तैयार रहें।
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